أدب الكاتب - الدِّينَوري، ابن قتيبة - الصفحة ٥٦ - باب تأويل كلام من كلام النّاس مستعمل
و يقولون [١] : «غضب و استشاط» : إذا [٢] احتدّ، و هو من «شاط يشيط» إذا احترق، كأنه [٣] التهب في غضبه، و قال [٤] الأصمعيّ: و هو [٥] من قولهم «ناقة مشياط» و هي التي يطير [٦] فيها السّمن سريعا [٧] .
و يقولون: «سكران ما يبتّ» أي: ما [٨] يقطع أمرا، من قولك «بتتّ الحبل» [٩] و «طلّقها ثلاثا بتّة [١٠] ، قال الأصمعي: و لا [١١] يقال يبتّ [١٢] ، و قال [١٣] الفرّاء: هما[٥٧]لغتان: بتتّ عليه القضاء، و أبتتّه.
و قولهم: «صدقة بتّة بتلة» من «بتلت» أي: قطعتها [١٤] ، يراد أنها بائنة من صاحبها مقطوعة لا سبيل له عليها، و منه قيل [١٥] لمريم العذراء «البتول» يراد [١٦] المقطوعة عن [١٧] الرجال.
[١] : س: و يقال.
[٢] : س: أي.
[٣] : ل، س: أي التهب. في م كما هنا.
[٤] : س: قال.
[٥] : ل، س: هو.
[٦] : ل، س، م: يظهر، و كذلك أثبتها ناشر مطبوعة ليدن، و لا وجه للعدول عما هنا.
[٧] : عبارة الأصمعي، في الإبل (مجموعة الكنز اللغوي: ١٠٥) : «و ناقة مشياط: إذا كانت سريعة السّمن» .
[٨] : س: لا.
[٩] : زاد في و: أي قطعته.
[١٠] : زاد في أ: بتلة، من بتلت أي قطعت. و زاد في و: بتلة.
[١١] : و: لا يقال.
[١٢] : و: أبتت.
[١٣] : ل، س: قال.
[١٤] : و: من بتلت أي قطعت.
[١٥] : أ، و: يقال.
[١٦] : س: أي المقطوعة.
[١٧] : أ، و: من.