مطلع انوار - حسینی طهرانی، سیّد محمّد حسین - الصفحة ٢٠٤ - أشعار ملاّ مِهرعلیّ تبریزیّ متخلّص به فدویّ «ها عَلیٌّ بَشَر کیف بَشَر»
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أسَدُ الله إذا صالَ و صاح |
أبو الأیتام إذا جادَ و بَرّ |
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حُبُّه مبدأُ خُلدٍ و نعیم |
بُغضُه مَنشأُ نارٍ و سَقَرْ |
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خَصمُه أبغضَه اللهُ و لَو |
حَمِد اللهَ و أثنَی و شَکَر |
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خِلُّه بَـشَّره اللهُ و لَو |
شَرِبَ الخَمرَ و غَنَّی و فَجَر |
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مَن له صاحِبةٌ کالزَّهراء |
أو سَلیلٌ کَشُبَیرٍ و شَبَر |
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مَن کَمَن هَلَّل فی مَهدِ صَبِیّ |
أو کَمَن کَبَّر فی عَهدِ صِغَر |
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عَنهُ دیوانُ علومٍ و حِکَم |
فیه طومار عِظاةٍ و عِبَر |
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بو تُرابٍ و کُنوزُ العالَم |
عِنده نَحوُ تُرابٍ و مَدَر |
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ظَلَّ ما عاشَ بِجوعٍ و صِیام |
باتَ ما حَیَّ بِدَمعٍ و سَهَر |
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کُلَّما أحزَنَه الدَّهرُ سَلا |
أینما استضعَفَه القومُ صَبَر |
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ناقَةُ اللهِ فیا شَقوَةَ مَن |
ما رَعاها فَتَعاطَی فعَقَر |
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أیُّها الخَصمُ تَذَکَّرْ سَنَدًا |
مَتنُه صَحَّ بنَصٍّ و خَبَر |
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إذ أتی أحمدُ فی خُمِّ غَدیر |
بِعَلیٍّ و علی الرَّحلِ نَبَر |
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قال مَن کُنتُ أنا مَولاه |
فَعَلیٌّ له مَولی و مَفَرّ |
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قبلَ تعیین وَصِیٍّ و وزیرٍ |
مَنْ رأی فاتَ نَبیٌّ و هَجَر“»[١] |
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سایه پیغمبر ندارد هیچ میدانی چرا |
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آفتابی چون علیّ در سایهاش افتاده است[٢] |
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[١]ـ جنگ ٢٣، ص ٣٨١.
[٢]ـ جنگ ١، ص ١٣٨.