یادداشتهای استاد ط-صدرا - مطهری، مرتضی - الصفحة ٣٨٥ - نهج البلاغه - موعظه و تذکر
یادداشتهای استاد مطهری، ج ٧، ص: ٣٨٥
ایضاً قصیده رثائیه ابوالحسن تهامی مشتمل بر مواعظی است:
حکم المنیة فی البریة جار | ما هذه الدنیا بدار قرار | |
بینا یری الانسان فیها مخبراً | حتی یری خبراً من الاخبار | |
طبعت علی کدر و انت تریدها | صفواً من الاقدار و الاکدار | |
و مکلف الایام ضد طباعها | متطلب فی الماء جذوة نار | |
فالعیش نوم و المنیة یقظة | و المرء بینهما خیال سار | |
فاقضوا مآربکم عجالًا انما | اعمارکم سفر من الاسفار | |
یا کوکباً ما کان اقصر عمره | و کذا تکون کواکب الاسحار | |
و هلال ایام مضی لم یستدر | بدراً و لم یمهل لوقت سرار | |
عجل الخسوف الیه قبل اوانه | فمحاه قبل مظنة الابدار | |
ان تحتقر [١] صغراً فرب مفخم | یبدو ضئیل الشخص للنظار | |
ان الکواکب فی محل علوّها | لتری صغاراً و هی غیر صغار | |
ولد المعزّی بعضه فاذا مضی | بعض الفتی فالکل فی الاثار | |
ابکیه ثم اقول معتذراً له | وفقت حین ترکت ألأمدار | |
جاورت اعدائی و جاور ربه | شتان بین جواره و جواری | |
فاذا نطقت فأنت اول منطقی | و اذا سکتّ فأنت فی اضماری | |
و تلهّب الاحشاء شیب مفرقی | هذا الضیاء شواظ تلک النار | |