اسرار الشهود فى معرفه الحق المعبود - اسيري لاهيجي، شمسالدين محمد - الصفحة ٣
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رند درد آشام مست از عشق تو |
زاهد بيچاره پست از عشق تو |
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در كنشت و دير ترسا و يهود |
روى دلهاى همه سوى تو بود |
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بت پرستان را تويى مطلوب جان |
هست از بت روى تو محبوب جان |
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گشت امرت را مسخر هركه هست |
بت پرست و مؤمن و ترسا و مست |
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ديدهام ذرات عالم را تمام |
از شراب عشق تو مست مدام |
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هريكى را مستى و ذوق دگر |
در دل هريك ز تو شوق دگر |
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جان جمله با جمالت آشنا |
هر يكى از خوان عشقت با نوا |
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آن يكى از جرعهاى مست و خراب |
وان دگر نوشيده درياى شراب |
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هريكى سرمست جام وصل يار |
وز غم هجران به جان در زينهار |
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غرقه آبند و مىجويند آب |
بيخود از مستى و گويان كو شراب |
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گشته جمله طالب ديدار تو |
جان هريك واقف اسرار تو |
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هريكى نوعى ترا جويان شده |
در ثنايت يكبيك گويان شده |
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غافل آن يك از ثناى يك دگر |
وين يكى از حمد آن يك بيخبر |
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جمله در تسبيح و در تهليل تو |
از نسيم وصل هريك برده بو |
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كافر و ترسا همه جوياى تو |
در درون جان هريك جاى تو |
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هريكى گشته ز اسمى مستفيض |
فيض آن يك فيض ديگر را نقيض |
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مظهر هادى به صدق از جان و دل |
شد عدوى مظهر اسم مضل |
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با وجود آنكه اين جوها روان |
شد از آن درياى بىقعر و كران |
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بازگشت جمله در دريا بود |
گر به جويش چند روزى جا بود |
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گرچه آب جمله از يك بحر بود |
لذت هريك بنوعى مىنمود |
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هركه در لذت مقيد مىشود |
ره به مطلق گر برد رد مىشود |
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رو نظر در بحر كن جورا مبين |
تا كه باشى عارف سر يقين |
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هرچه از ياد خدا و طاعتش |
مانعت آيد مگو جز آفتش |
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هرچه مشغولت كند از ياد دوست |
دشمنش دان فى المثل گر جان و پوست |
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هرچه دور اندازدت از وصل يار |
در حقيقت دشمن جانت شمار |
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