فرسان الهيجاء - المحلاتي، الشيخ ذبيح الله - الصفحة ٤٥٧ - سلالة النبوّة عليّ الأكبر عليهالسلام
جودى
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بابا بيا که تيغ جفا ساخت کار من |
برگى نچيده گشت خزان نوبهار من |
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قاتل مرا زخنجر کين پاره پاره کرد |
رحمى نکرد بر مژه اشکبار من |
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تا بر تنم بود رونقى در سرم بيا |
بنگر بوقت مرگ بر احوال زار من |
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از تيغ ظلم رشته عمرم زهم گسيخت |
ليلا بگو دگر نکشد انتظار من |
مباراة الشعر بالعربيّة أو تقريب معناه :
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هلمّ أبي فالسيف شقّ مفارقي |
وعصف خريف العمر جرّد أغصاني |
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وقطّعني الباغي بصارم حقده |
وما لان من دمعي عليكم بأجفاني |
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هلمّ أبي واسرع لموضع مصرعي |
وبي رمقٌ أخشى بأن لست تلقاني |
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قضى عمري بالسيف من ضرب ظالم |
أبي قل لليلى بعدها لا ترجّاني |
قال الشيخ علي ابن شيخ العراقين
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چه رفت از دست عشق شاه دلبندم |
روان شد از پى گمگشته فرزند |
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صف دشمن دريدى از چپ وراست |
نواى الحذر از نينوا خاست |
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عقابى ديد ناگه پرشکسته |
على افتاده زين از هم گسسته |
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برخسارش نقاب از خون کشيده |
به جانان بسته جان از خود بريده |
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شده شقّ القمر سر تا جبينش |
بخون آغشته زلف عنبرينش |
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زضرب نيزه وتير وسنانش |
شده جسمش مقطّع جان فدايش |
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فرود آمد ززين آن با جلالت |
چه پيغمبر زمعراج رسالت |
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نهادى بر سر زانو سرش را |
همى بوئيد خونين پيكرش را |
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برآورد از دل تفتيده آهنى |
که سوزانيد از مه تا بماهى |
مباراة الشعر بالعربيّة أو تقريب معناه :
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ولمّا هوى قلب الحسين بكربلا |
وقد نال منه السيف عاد بلا قلب |