فرسان الهيجاء - المحلاتي، الشيخ ذبيح الله - الصفحة ٣٩٥ - عليّ الأصغر الرضيع
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گلويش بردريد از گوش تا گوش |
خوش الحان مرغ شد گرديد خاموش |
مباراة الشعر أو تقريب معناه بالعربيّة :
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رأى سيّد الدنيا الفريد لسانه |
ووجنته اصغرّا كطاقة آس |
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ولا من لبان يسعف الطفل ظامئاً |
ولا ماء يسقيه ولا يد آسي |
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ولا صبر عند الطفل كي يقهر الظما |
فكان بقلب السبط حزُّ مواسي |
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فقبّل خدّ الورد في الطفل باكياً |
وناء بحزن لم تطقه رواسي |
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تنسّم ريح المسك عند وريده |
فعادت له الأحلام بعد شماس |
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وأطلق نحو الطفل سهمٌ لقتله |
لعين من الأعاء صعب مراس |
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ولمّا بدى نحر من الطفل لامع |
وقد كان ظمئآن الفؤاد يقاسي |
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ولاح بياض الصبح من فجر نحره |
رماه بسهم الغدر صاحب باس |
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فمزّق منه النحر أيّ ممزّق |
لعين حقير من أُميّة قاسي |
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وعاد به السبط الكئيب لأُمّه |
فنادت بوجد هل سقيت غراسي |
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فناولها الطفل الذبيح فولولت |
ولم ترَ إلّا الدمع سال مواسي |
وقال في زبدة الأسرار
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بود طفلى شير خوار اندر حرم |
کافرينش را پدر بود در کرم |
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خورده از پستان فضل آن پسر |
شير رحمت طفل جان بوالبشر |
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ممکنات از عالم وآدم همه |
از دم جان پرورش يك دم همه |
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گرچه خوانند اهل عالم اصغرش |
من ندانم جز ولى اکبرش |
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بنگ بر زد که اى غريب بى نوا |
نيستى بيكس هنوز اين سو بيا |
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مانده باقى بين زاصحاب کرم |
شيرخواره خسته جانى در حرم |