فرسان الهيجاء - المحلاتي، الشيخ ذبيح الله - الصفحة ١١٠ - جون مولى أبي ذر
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هر چند که بويم بته رنگ سياهست |
پاکيزه وروشن شود ار قابل شاهست |
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با مهر تواَم چهره سيه خيرت ماه است |
سرگشته راه تور دادار گواه است |
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اين است مقصد وجان واقف راه است |
درشاه پرستى همه را رتبه وجاه است |
منهم بفداى تو غلامِ درِ ايشان
مقابلة بالعربيّة ..
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لقد زاد عزّاً في الزمان تطامنت |
له غرر الأحساب جون بجهده |
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غداة سما إذن الجهاد بنفسه |
ونال بسيف قاتل نجم سعده |
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وقال لمولاه الحسين ودمعه |
يسيل كغيث هاطل فوق خدّه |
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أمولاي إنّي العبد عند قصاعكم |
فهل يمنع المولى شهادة عبده |
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لعلّي أنال المجد تحت لوائكم |
وهل يرتقي الإنسان إلّا بمجده |
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أرى الفوز في لقيام الحمام بساحكم |
كراضٍ بلسع النحل من أجل شهده |
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ولوني وريحي قد هوى بي كلاهما |
فدعني ينلني المجد سيفي بحدّه |
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ولا حسبي زاكٍ ولا الأصل صالح |
فلا تحرم العبد الجنان بردّه |
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عساني أنال الخير عند محمّد |
وأصبح يوم الحشر من بعض جنده |
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فيبيضّ وجهي أو تطيب أرومتي |
ويعذب ريحي إذ أفوز بوعده |
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أقيل غداة الروع تحت أراكه |
وأسعد في اللأواء في ظلّ رنده |
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ويخلد ذكري في الزمان ومن ينل |
رضاكم غداً يوم القيامة يجده |
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وأسعد في لقيا التبولة إذ ترى |
دم البسيط يلقى المزج في دم عبده [١] |
[١] على عادتي في الترجمة أتناول قطعة الشعر فألمّ ببعض معناها ثمّ أنظم قطعة شعريّة قريبة الشبه بها وإن لم تكن ترجمة لها ، وهذا عندي اجدى من ترجمتها نثراً. (المترجم)