فرسان الهيجاء - المحلاتي، الشيخ ذبيح الله - الصفحة ٤٦٣ - سلالة النبوّة عليّ الأكبر عليهالسلام
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نوجوان ديده گشا ديده گريانم بين |
اى پسر يك نظرى کن تو بجان پدرت |
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داد از قاتل بى رحم تو دارم هر دم |
که بشمشير جفا ريخته اين مغز سرت |
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داغ تو هجران تو يكباره نمودم پيرى |
واى بر حال دل مادر خونين جگرت |
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بشنود گر خبر مرگ تو ليلاى حزين |
يا آرد زتو ومحنت شام وسحرت |
مباراة الشعر بالعربيّة أو تقريب معناه :
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وأفقدني صبري نداءك يا أبي |
لذاك سريعاً قد تركت مضاربي |
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لأنظر وجهاً كان نور نواظري |
بدى مثل بدر في دم الأفق غارب |
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رأيت جنان الله ثمّ تركتني |
فمن لأبٍ في الحزن ناعٍ ونادب |
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فهل غصن المرجان هذا أم أنّه |
دم الفرق يبدو في الدماء السواكب |
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أيا شبه جدّي يا ذبيحاً بكربلا |
ويالدم يجري بوجهك خاضب |
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على وجهك البدر النجيع مضمّخاً |
كمثل غشاء راح للبدر حاجب |
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ويا ولدي انظرني فدمعي هامل |
أشدّ انهماراً من ضروع السحائب |
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فويل لمن أسدى لرأسك ضربه |
فأسدى إلى الإسلام شرّ المصائب |
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لقد هدّني سيف عراك فرنده |
فكيف بأُمّ لم تزل في النوادب |
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فكيف بها إن أبلغوها بما جرى |
ألا ارفق بأُمّ طعمة للنوائب |
وقيد
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چه زود بود اى پسر |
که چون ستاره سحر |
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غروب کردى از نظر |
اجل بشد دچار تو |
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