فرسان الهيجاء - المحلاتي، الشيخ ذبيح الله - الصفحة ٤٤٩ - سلالة النبوّة عليّ الأكبر عليهالسلام
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واى بر من کز جفا بايد زکوفه تا بشام |
همرهى با قاتل بى رحم بدخويت کنم |
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اى دريغا شمر نگذارد دمى در قتلگاه |
از دل خونين فغان اندر سر کويت کنم |
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رأس تو در روبرويم تا چهل منزل دريغ |
خصم نگذارد دمى تا يك نظر سويت کنم |
مباراة الشعر بالعربيّة أو تقريب معناه :
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إليّ إليّ يا ولدي فإنّي |
أُريد أشمّ فيك شذى الورود |
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وأُمتع ناظريّ بحسن وجهٍ |
كأنّ عليه طالعة السعود |
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فأخشى أن تفارقني طويلاً |
وأن لا نلتقي في ذا الوجود |
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تغادر منزلي كضياء عيني |
وأُغرق في مشاهد منه سود |
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هلمّ لكي أُرجّل منك شعراً |
برمشي يا لهاتيك الجعود |
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تمهّل قبل أن تغدو ذبيحاً |
على اسم الله في أرض الوعود |
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وأجعل كحل عينك من فؤادي |
دخاناً إذ غدى كدخان عود |
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بنيّ وقف إلى جنبي قليلاً |
ليخزى السرو من هذي القدود |
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ويا من قبلتي صارت إليه |
وفي محراب حاجبه سجودي |
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فيا ويلي غداة غدٍ سأسبي |
وأُحمل في السبا بين القرود |
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ويأتي الشمر يضربني بسوط |
إذا ما سال دمعي في خدودي |
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وتشرق أنت في رمح أمامي |
نظير الصقر صار إلى صعود |
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ويضربني العدو لرفع عيني |
لوجهك إنّ ذا فعل العبيد |
وله أيضاً
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وه چه اکبر قدش افکند زپا طوبى را |
نور بخشيده زخش مهر جان آرا را |