فرسان الهيجاء - المحلاتي، الشيخ ذبيح الله - الصفحة ٤٤٦ - سلالة النبوّة عليّ الأكبر عليهالسلام
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وتسعد في النشور غداً بعيش |
رخيّ عند ربّ ذي جلال |
آتشكده
قالها في مبارزة عليّ الأكبر عليهالسلام :
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شاهزاده سوى ميدان شد روان |
در قفايش بانوان نوحه کنان |
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حقّه لب بر ستايش کرد باز |
که منم فرزند سالار حجاز |
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من على بن الحسين اکبرم |
نور چشم زاده پيغمبرم |
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حيدر کرّار باشد جدّ من |
مظهر نور ونبوّت حدّ من |
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تيغ من باشد سليل ذوالفقار |
که سليل حيدرم در کارزار |
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آمدم تا خود فداى شه کنم |
جان وقاى نفس ثار الله کنم |
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اين بگفت صارم جوشن شکاف |
با لب تشنه برآورد از غلاف |
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آنچه مير بدر با کفّار کرد |
سبط حيدر اندر آن کفّار کرد |
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بسکه آن شير دلاور يكتنه |
زد يلان را ميسره بر ميمنه |
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پر دلان را شد دل اندر سينه خون |
لخت لخت از چشم جوشن شد برون |
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شير بچه از عطش بى تاب شد |
بال لب خشکيده سوى باب شد |
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گفت شاها تشنگى تابم ربود |
آمدم نک سويت اى درياى جود |
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برده ثقل آهن وتاب هجير |
صبرم از پا دست گيرا دست گير |
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شه زبان از گرفت اندر دهان |
گوهرى در درج لعل آمد نهان |
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تر نکرده کام از او ماه عرب |
ماهى از دريا برآمد خشک لب |
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شاه جم شوکت گرفت اندر برش |
هشت بر درج گهر انگشترش |
مباراة الشعر بالعربيّة أو تقريب معناه :
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قد دخل الحرب عليّ مسرعا |
وخلفه النساء تجري الأدمعا |
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مرتجزاً فيهم أنا ابن المرتضى |
ليث الحجاز من أطاعه القضا |