فرسان الهيجاء - المحلاتي، الشيخ ذبيح الله - الصفحة ٣١٠ - مولانا باب الحوائج أبوالفضل العبّاس عليهالسلام
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افتاد رود خاک وندا زد که يا اخا |
دريابم از وفا وبيارى برار دست |
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شاها بيا که جان کنم ايثار مقدمت |
آنسان که در ره نمودم نثار دست |
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سلطان دين چه ناله دلسوز او شنيد |
تعجيل کرد که ببالين او رسيد |
مباراة الشعر بالعربيّة وتقريب روح النصّ الفارسي :
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أيا أباً للفضل يا والد |
بوركت أنت الجيش والقائد |
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من جودك البحر بلا ساحل |
يجري فراتاً موجه الصاعد |
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كم ارتوت من عذبه أُمّة |
لا ناقص عنها ولا نافد |
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ملكت نهر العلقمي ظامياً |
لا شارب منه ولا وارد |
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وعُدت في قلبك حرّ الظما |
كالنار إذ يوقدها الواقد |
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همّته تظهر في صبره |
على الظما لم يغره البارد |
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في متنه الجود وفي كفّه |
يردي الأعادي سيفه الحاصد |
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كأنّه السحاب عشّاهم |
والسيف فيه البارق الراعد |
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جاؤوا إلى الشاطئ يحمونه |
أنّي وعبّاس هو القاصد |
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أنّى يخيف الأسد في غيلها |
كلب عوى أو ثعلب حاقد |
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أمّهم سيف أبي فاضل |
فليس إلّا الراكع الساجد |
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سالوا دماً من حرّ صمصامه |
كما يدق الحجر الجامد |
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وانكفئوا لمّا رأوا سيفه |
وطار رعباً منهم المارد |
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ما كان محتاجاً إلى سيفه |
ينوب عنه النظر الحارد |