فرسان الهيجاء - المحلاتي، الشيخ ذبيح الله - الصفحة ٣٠٧ - مولانا باب الحوائج أبوالفضل العبّاس عليهالسلام
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قومي استعدي للسبا |
أمر به قلم جرى |
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وأتى لمصرعه الهدى |
وعليه مدمعه جرى |
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لمّا رآه ملفّعاً |
بدم رداءاً أحمرا |
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ملأ الفضا بآهة |
فكأن أثرت المجمرا |
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أسفاً على هذا الجمال |
على التراب مبعثرا |
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لم تشرب العذب الزلال |
ومن أمامك قد جرى |
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بدماك أرويت الظما |
وغداً ستُسقى الكوثرا |
شعر اختر الطوسى رحمهالله
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عبّاس شبل شير خدواند کافتاب |
هر صبح بوسه اش بدر آستان دهد |
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درياى جود وبذل ابوالفضل کشروان |
خجلت زفرّ خويش بقصر جنان دهد |
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چرخ جلال ماه بنى هاشم آنکه نور |
از رأى وروى به مهر ومه وآسمان دهد |
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باب الحوائج است هر آن کو زباب او |
هر حاجتى که کرد تمنّا همان دهد |
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اندر ره برادر خود غير او کسى |
نشنيده ام که تن به بلاد جهان دهد |
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سوى فرات آمد وشرم آمدش کز آب |
تسکين تشنگى زبان در دهان دهد |
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دستش جچا شود زتن وباز |
پهلو به رمح وفرق به گرز گران دهد |
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سقّا کسى نديده بجز اوى که در جهان |
جان تشنه کام در لب آب روان دهد |
مباراة الشعر أو تقريب المعنى بالعربيّة إلى روح النصّ الفارسي :
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تقبّل الشمس إذا أشرقت |
أعتاب عبّاس سليل الأسد |
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بحر السخا تخجل في فضله |
أن تقرن الجنّة أو أن تعد |
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قد أكسب العالم من نوره |
بغرّة تزهو ورأي أسد |
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لاذ ذوو الحاجات في بابه |
كلّ يدٍ مُدّت له لا تُرَد |