فرسان الهيجاء - المحلاتي، الشيخ ذبيح الله - الصفحة ٣٠١ - مولانا باب الحوائج أبوالفضل العبّاس عليهالسلام
من نظم الشيخ عليّ شيخ العراقين
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بسوى آب شد سقّاى محشر |
برزم اندر بُدِى سبط پيمر |
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بآب اندر شدى ميراب هستى |
چه سيل کوهسار آنسوى پستى |
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يم رحمت چه در يم شد شناور |
خميد از پشت خنک کوه پيکر |
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کف کافيش پر بنمود از آب |
که سازد لعل خشک از آب سيراب |
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بياد تشنگان وادى غم |
فراتش در نظر شد بحرى از سم |
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بخود مى گفت باشد از ادب دور |
که من سيراب وشه از آب مهجور |
تقريب المعنى بالعربيّة لروح النصّ الفارسي :
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ويمّم الفرات ساقي المحشر |
لنصرة ابن المصطفى المطهّر |
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بدى كسيل قاصداً جمع العدى |
من قمم الشمّ جرى منحدر |
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كأنّه فوق الجواد راكباً |
يلملم أعظم به من منظر |
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مدّ يداً تغترف الماء لكي |
يطفئ حرّاً في الحشى من سعَر |
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تذكّر العطشى بوادي كربلا |
فأصبح الفرات بحراً من شري |
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فقال لا لن أرتوي وسيّدي |
بكبد من الظما منفطر |
وله أيضاً
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صف دشمن دريدى همچه کرباس |
بيامد بر سر بالين عبّاس |
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فرود آمد ززين آن با جلالت |
چه پيغمبر زمعراج رسالت |
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بدامن برگرفت آنکه سرش را |
همى بوئيد خونين پيکرش را |
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برآورد از دل تفديده آهى |
که سوزانيد از مه تا به ماهى |
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بگفتش که اى سپه دار قبيله |
زمرگت مر مرا کم گشت حيله |
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شکستى پشتم اى شمشاد قامت |
نمى يابد درستى تا قيامت |