رساله نفس - ابن سينا - الصفحة ٢٦ - باب «دوّم» در بيان قوتهاء نفس
(مستفاد) [١] «گويند» [٢]. (و) [٣] چون نفس مردم بدين غايت «رسيد» [٤] در علم، و اخلاق [وى] [٥] بر جهت فضيلت باشد. (و) [٦] اين غايت «كمال» [٧] مردم است و درين غايت نفس مردم در «رتبت» [٨] ملك باشد، بدان سبب كه نفس مردم» [٩] جوهريست «عملى» [١٠] چنان كه درست كرده «اند» [١١].
و «اين» [١٢] جوهر دو روى دارد: «يكى» [١٣] سوى عقل فعّال، و آن عقل نظرى است و از آنجا اقتباس «علم مىكند» [١٤]. و «ديگر روى» [١٥] سوى بدن دارد و آن عقل عمليست. و بدين قوت تصرف كند در بدن و هر «آنگه» [١٦] كه نفس مردم از جهت «عقول» [١٧] نظرى «معقولات
[١] - از اصل نسخه متن ساقط شده و در نسخ ديگر هست.
[٢] - نسخ ديگر: خوانند.
[٣] - ف: پس- نسخ ديگر مانند متن.
[٤] - ل د م س: رسد- ف: رسيده باشد.
[٥] - ف ندارد.
[٦] - ف افزوده.
[٧] - س آ: كار- ف: فعالى نفس.
[٨] - ح: مرتبت.
[٩] - ف، او.
[١٠] - نسخ ديگر، عقلى- و صحيح همين طور است.
[١١] - در نسخ ديگر: آيد.
[١٢] - م د ح ل: آن.
[١٣] - م د ل ح: يكى روى.
[١٤] - ف: كند اقتباس علم- ح: اقتباس علوم مىكند- نسخ ديگر: اقتباس علوم كند.
[١٥] - ف: يكى- ح س آ م د ل: يك روى.
[١٦] - د ح ل: و هر آنگاه- ف س آ: و هرگاه.
[١٧] - نسخ ديگر: عقل.