ادبيات سياسى تشيع - آيينه وند، صادق - الصفحة ٨٦
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از چُنين عزّ و دولتِ ظاهر |
هم عرب هم عجم بود قاصر |
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جدّ او را به مسندِ تمكين |
خاتَم الأنبيا است نقشِ نگين |
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لائِح از روىِ او فروغِ هُدى |
فائِح از خوىِ او شميمِ وفا |
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طلعتش آفتاب روزافرزو |
روشنايى فزاى و ظُلمتسوز |
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جدِّ او مصدرِ هدايتِ حقّ |
از چُنان مصدرى شده مشتق |
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از حيا نايدش پسنديده |
كه گُشايد به روىِ كس ديده |
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خلق از و نيز ديده خوابانند |
كز مَهابت نگاه نتوانند |
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نيست بى سبقتِ تبسّمِ او |
خلق را طاقتِ تكلّمِ او |
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در عرب در عجم بُوَد مشهور |
گو مَدانش مُغَفَّلى مغرور |
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همه عالم گرفت پرتوِ خَور |
گر ضَريرى نديد از او چه ضرر؟ |
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شد بلند آفتاب بر افلاك |
بوم اگر زان نيافت بهره چه باك؟ |
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بر نكو سيرتان و بدكاران |
دست او ابرِ موهبت باران |
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فيضِ آن ابر بر همه عالم |
گر بريزد نمىنگردد كم |
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هست از آن معشرِ بلند آيين |
كه گذشته ز اوجِ عِلّييّن |
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حُبِّ ايشان دليلِ صدق و وفاق |
بُغضِ ايشان نشانِ كفر و نفاق |
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قُربشان پايهى علوِّ جلال |
بُعدشان مايهى عُتوِّ و ضلال |
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گر شمارند اهل تقوى را |
طالبان رضاىِ مولى را |
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اندر آن قوم مقتدا باشند |
وندر آن خيل پيشوا باشند |
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گر بپرسد ز آسمان بالفرض |
سائلى: «مَنْ خِيارُ أَهْلِ الأَرض؟» |
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به زبانِ كواكب و انْجُم |
هيچ لفظى نيايد إِلّا «هُمْ» |
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هُمْ غُيوثُ النَدّى إِذا وَهَبُوا |
هُمْ لُيُوثُ الثَّرَى إِذا نَهَبُوا |
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ذكرشان سابق است در افواه |
بر همه خلق بعدِ ذكرِ اللّه |
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سرِ هرنامه را رواج فزاى |
نامشان هست بعدِ نامِ خداى |
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ختمِ هرنظم و نثر را الحق |
باشد از يُمنِ نامشان رونق |
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چون هِشام آن قصيدهى غَرّا |
كه فرزدق همى نمود انشا |
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